भक्ति का वास्तविक अर्थ क्या होता है ?

March 18, 2021by Astro Sumit0

भक्ति एक ऐसा शब्द है जो प्रायः लगभग सभी लोग प्रयोग करते है। किंतु ऐसे कितने लोग है जो भक्ति का वास्तविक अर्थ जानते है। भक्ति शब्द की व्युत्पत्ति ‘भज्’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ होता है ‘सेवा करना’ या ‘भजना’ है, अर्थात् श्रद्धा और प्रेमपूर्वक अपने इष्ट देवता के प्रति आसक्ति। ईश्वर के प्रति जो परम प्रेम है उसे ही भक्ति कहते हैं। अनेक ग्रंथो में कहा भी गया है कि ‘परमात्मा’ के प्रति परम प्रेम को भक्ति कहते हैं।

भक्ति का वास्तविक अर्थ क्या होता है ?

इसको प्राप्त कर मनुष्य अमर हो जाता है अर्थात भक्ति के द्वारा भक्त सदैव याद रखा जाता है क्योंकि भक्त कभी मरता नही है बल्कि भक्त तो भगवान मे समा जाता है। यदि ईश्वर के प्रति परम प्रेम भक्ति है तो फिर लौकिक विषयों के प्रति जो हमारा प्रेम है वह क्या है? लौकिक विषय अर्थात सांसारिक विषय वह केवल आसक्ति है। जैसे अपनी देह अथवा पत्नी अथवा घर या अन्य विषयों के प्रति जो प्रेम है उसे आसक्ति कहते हैं। हर किसी से किया गया प्रेम भक्ति नहीं होता है।

वास्तव में भक्ति, भजन है। अब प्रश्न होगा किसका भजन करें ? भजन सदैव श्रेष्ठ का किया जाता है। अर्थात ईश्वर का भजन या गुरुदेव (महान व्यक्ति / महापुरूष) का भजन। महान् वह है जो चेतना के स्तरों में मूर्धन्य हो, पूजनीयों में पूजनीय है। जिसके विचारों में शुचिता (पवित्रता) हो, जो अहंकार से दूर हो, जो किसी वर्ग-विशेष में न बंधा हो, जो सबके प्रति सम भाव वाला हो, सदा प्रभु सेवा भाव मन में रखता हो, ऐसे व्यक्ति विशेष को हम भक्त का दर्जा दे सकते हैं।
भक्ति के द्वारा साधक को पूर्ण स्वाधीनता, पवित्रता, एकत्व भावना तथा प्रभुप्राप्ति जैसे मधुर फल प्राप्त हो सकते है। प्रभुप्राप्ति का अर्थ जीव की समाप्ति नहीं होता है बल्कि प्रभु का अनुभव करना होता है। अर्थात प्रभु में अवस्थित होकर आनन्द का अनुभव करना है।
संतो ने ऐसा कहा भी है कि जिस प्रकार अग्नि के पास जाकर ठंड की निवृत्ति तथा गर्मी का अनुभव होता है, उसी प्रकार प्रभु के पास पहुँचकर दुःख की निवृत्ति तथा आनन्द की प्राप्ति होती है। भगवान् में हेतु रहित, निष्काम एक निष्ठायुक्त, अनवरत प्रेम का नाम ही भक्ति है।

भक्ति तर्क पर नहीं, श्रद्धा एवं विश्वास पर अवलंबित है। मनुष्य ज्ञान से भी अधिक श्रद्धामय है। मनुष्य जैसा विचार करता है, वैसा बन जाता है, इससे भी अधिक सत्य इस कथन में है कि मनुष्य की जैसी श्रद्धा होती है उसी के अनुकूल और अनुपात में उसका निर्माण होता है।

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